दुनिया भर में हर साल लगभग 8 लाख लोग आत्महत्या करते हैं। भारत में यह संख्या 135000 के आसपास है, जो कि विश्व की कुल आत्महत्याओं का लगभग 17% है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, आत्महत्या युवाओं में मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण है। हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है, और हर 3 सेकंड में कोई आत्महत्या की कोशिश करता है। यह आंकड़े बेहद चौंकाने वाले और चिंता बढ़ाने वाले हैं। विशेष रूप से भारत में, आत्महत्या के मामलों में तेजी से वृद्धि हो रही है। शिक्षा के क्षेत्र में, कोटा जैसे कोचिंग हब इस समस्या का बड़ा उदाहरण हैं। 2024 में अब तक 16 छात्रों ने आत्महत्या की है। कोचिंग सेंटर का दबाव, माता-पिता की अपेक्षाएं और मानसिक मजबूती की कमी ऐसे कदम उठाने के लिए मजबूर करती है। बच्चे यह सोचने लगते हैं कि उनके माता-पिता ने अपनी गाढ़ी कमाई से उनकी शिक्षा के लिए जो पैसे खर्च किए हैं, अगर वे सफल नहीं हुए, तो वे अपने माता-पिता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाएंगे। यह डर उन्हें आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर कर देता है।
विवाहित जीवन में भी आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। हाल ही में दो पुरुषों द्वारा की गई आत्महत्याओं ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। एक मामले में अतुल सुभाष नाम के व्यक्ति ने आत्महत्या से पहले 1 घंटे 25 मिनट का वीडियो बनाया, जिसमें उन्होंने अपनी परिस्थितियों को विस्तार से बताया। उन्होंने अपनी पत्नी और ससुराल वालों द्वारा किए गए व्यवहार को आत्महत्या का कारण बताया। दूसरा मामला दिल्ली के कैफे मालिक पुनीत खुराना का था, जिनकी आत्महत्या के पीछे भी पारिवारिक तनाव था। आत्महत्या केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है। इसके लिए समाज, परिस्थितियां और आसपास का माहौल भी जिम्मेदार होता है। समाज की कठोरता, परिवार का दबाव, और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की कमी इसे और बढ़ावा देते हैं। यदि किसी के मन में आत्महत्या का विचार आ रहा है, तो उसे अपने प्रियजनों से बात करनी चाहिए। परिवार और दोस्तों की जिम्मेदारी है कि वे उसकी समस्याओं को सहानुभूति और संवेदनशीलता के साथ सुनें।
हालांकि, व्यक्ति को खुद भी मानसिक रूप से मजबूत बनना होगा। अपने अंदर यह विश्वास जगाना होगा कि हर समस्या का समाधान संभव है। इसके अलावा, आत्महत्या रोकने के लिए समाज को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना बहुत जरूरी है। हर साल 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है, ताकि इस विषय पर जागरूकता फैलाई जा सके। भारत में इस दिशा में जागरूकता की अभी भी कमी है। हमें इस समस्या को केवल व्यक्तिगत मुद्दा मानने के बजाय एक सामूहिक जिम्मेदारी समझना होगा। एक ऐसा समाज बनाना होगा, जहां हर व्यक्ति एक-दूसरे के प्रति सहानुभूतिपूर्ण और संवेदनशील हो। केवल तभी आत्महत्या की घटनाओं में कमी लाई जा सकती है।
