बुधवार, 18 दिसंबर 2024

बुढ़ापे का समय


 यह सच है कि यदि बच्चों को बचपन में अच्छे संस्कार न दिए जाएं, तो जब वे बड़े होकर कमाने लायक होते हैं, तो कहीं न कहीं माता-पिता के लिए बोझ बन जाते हैं। इसमें बच्चों का दोष नहीं होता, बल्कि माता-पिता का होता है, जिन्होंने उन्हें जिम्मेदारियों का एहसास नहीं कराया। बचपन में जरूरत से ज्यादा आजादी देना और खुले पैसे देना अक्सर बच्चों में गैर-जिम्मेदाराना रवैये को बढ़ावा देता है।

जब बच्चों की शादियां होती हैं, तो माता-पिता अक्सर अपने सामाजिक स्तर को देखकर फैसले लेते हैं। उदाहरण के लिए, लड़की की शादी यह सोचकर कर दी जाती है कि लड़के का परिवार अच्छा है, या उसके पिता किसी उच्च पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। लेकिन यदि लड़का निकम्मा और माता-पिता पर निर्भर है, तो शादी के बाद कुछ समय तक सब ठीक चलता है। जैसे ही परिवार बढ़ता है और जिम्मेदारियां बढ़ती हैं, वह उनसे बचने लगता है और सारी जिम्मेदारियां फिर से अपने माता-पिता पर छोड़ देता है।

दूसरी ओर, शादी के बाद लड़की अपने पिता की आर्थिक सहायता को अपनी ताकत मानती है। वह अपने ससुराल में यह जताती रहती है कि उसके पिता हर मुश्किल में उसका सहारा हैं। लेकिन जब पिता नहीं रहते, तो बेटा और बेटी दोनों का यह सहारा खत्म हो जाता है। धीरे-धीरे परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगती है।

इस बीच, बूढ़ी मां, जो चलने-फिरने में असमर्थ होती है, अपने बेटे और बेटी से उम्मीद लगाए रहती है। लेकिन वही बच्चे, जो कभी अपने माता-पिता के सहारे सबकुछ मांगते थे, अब गैर-जिम्मेदार हो जाते हैं। बेटी कहती है कि उसे अपने ससुराल की जिम्मेदारियां निभानी हैं, और बेटा कहता है कि उसके पास पैसे नहीं हैं। मां की पेंशन से घर का खर्च चलता है और कुछ हिस्सा उसकी दवाओं पर खर्च होता है।

जो घर कभी खुशियों और समृद्धि से भरा था, वह अब डूबते सूरज जैसा नजर आता है। बिस्तर पर पड़ी बूढ़ी मां यह सब चुपचाप देखती है, आंखों में आंसू लिए यह सोचती है कि उसकी सेवा कौन करेगा। मजबूरी में बहू उसकी देखभाल करती है, लेकिन केवल इसलिए कि सास की पेंशन से घर चल रहा है।

यह स्थिति केवल इसलिए उत्पन्न होती है क्योंकि बचपन में बच्चों को सही संस्कार नहीं दिए गए। उन्हें यह नहीं सिखाया गया कि जिम्मेदारियां कैसे निभानी हैं और माता-पिता की सेवा करना उनका कर्तव्य है।

बुढ़ापा हर किसी के जीवन में आता है, लेकिन इसे दुख और तन्हाई का समय न बनने देना हमारे हाथ में है। अगर हम बचपन से बच्चों को अच्छे संस्कार दें, उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाएं, और यह सिखाएं कि कम संसाधनों में भी एक अच्छा जीवन जिया जा सकता है, तो हमारा बुढ़ापा भी सुखद हो सकता है। जैसा हम अपने माता-पिता के साथ करेंगे, वैसा ही हमारे बच्चे हमारे साथ करेंगे। इसलिए हमें आज से ही यह समझने और सिखाने की जरूरत है कि माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म और कर्तव्य है।

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