आज के समय में गांव से शहर की ओर पलायन एक महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बन गया है, विशेष रूप से युवा वर्ग के बीच। यदि हम 1947 में भारत की आजादी के समय की बात करें, तो उस समय लगभग 17 प्रतिशत जनसंख्या शहरों में निवास करती थी। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद, दिल्ली, मुंबई, मद्रास और कोलकाता जैसे कुछ शहर तेजी से विकसित हुए। इसके साथ ही पंचवर्षीय योजनाओं के तहत देश के विकास पर जोर दिया गया, जिससे आर्थिक गति को तेज किया जा सके और गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से निजात पाई जा सके।हरित क्रांति और शहरीकरण जैसी नीतियों ने देश में रोजगार के नए अवसर पैदा किए, जिससे लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर आकर्षित होने लगे ताकि वे अपने जीवन स्तर को ऊंचा उठा सकें। 2021 के आंकड़ों के अनुसार, भारत की शहरी जनसंख्या बढ़कर लगभग 35-36% हो गई है, जो दर्शाता है कि शहरीकरण की गति तेजी से बढ़ रही है। इस बढ़ती शहरीकरण दर के पीछे मुख्य कारण रोजगार के अवसर, बेहतर जीवनशैली और आधुनिक सुविधाओं की तलाश है।
गांवों में जीवन की चुनौतियां: गांव छोड़कर शहरों में बसने के बाद, लोग केवल अपनी जीविका तक ही सीमित रह जाते हैं। वहीं, पीछे गांव में उनके माता-पिता अकेले रह जाते हैं। शहरों में रहने वाले लोग जब गांव में सब्जी या राशन मंगवाना चाहते हैं, तो उन्हें किसी के माध्यम से पैसे देकर मंगवाना पड़ता है। सरकारी राशन डिपो से सामान लाना भी एक मुश्किल कार्य बन जाता है, क्योंकि गांवों में संसाधनों की कमी होती है। स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें, तो गांवों में प्रशिक्षित डॉक्टरों की अनुपस्थिति के कारण झोलाछाप डॉक्टरों का बोलबाला है। किसी के बीमार पड़ने पर तुरंत ऐसे डॉक्टरों को बुलाया जाता है, जो बिना उचित जांच किए पेनकिलर, मल्टीविटामिन और एंटीबायोटिक दवाएं देकर मरीज को लौटा देते हैं। इससे न केवल स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, बल्कि लोग दवाओं के आदी भी बनते जा रहे हैं।
सामाजिक रिश्तों में बदलाव : शहरी जीवनशैली अपनाने के कारण नई पीढ़ी का अपने पारंपरिक रिश्तों से भी दूर होना स्वाभाविक हो गया है। गांवों में लौटने पर वे अपने रिश्तेदारों को चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मामा-मामी कहने के बजाय अंकल-आंटी कहने लगे हैं, जिससे पारिवारिक संबंधों की गर्माहट धीरे-धीरे खत्म हो रही है।
कोविड-19 महामारी के दौरान पलायन का उल्टा प्रवाह : कोविड-19 महामारी के दौरान, विशेष रूप से 2020 में लगे लॉकडाउन के समय, शहरों में रोजगार के अवसर कम हो गए, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर शहरों से वापस अपने गांवों की ओर लौटे। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) के एक अध्ययन के अनुसार, लॉकडाउन के बाद ग्रामीण क्षेत्रों की आबादी में लगभग 7% की वृद्धि हुई, जबकि शहरी क्षेत्रों की आबादी में 11% की कमी आई। हालांकि, यह प्रवृत्ति अस्थायी थी। जैसे ही लॉकडाउन में ढील दी गई और आर्थिक गतिविधियाँ पुनः शुरू हुईं, कई प्रवासी मजदूर वापस शहरों की ओर लौट आए। फिर भी, इस अवधि ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की कमी को उजागर किया, जिससे भविष्य में ग्रामीण विकास पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर बल मिला।
समाधान की आवश्यकता: गांवों से बढ़ते पलायन को रोकने के लिए सरकारों को रोजगार और कौशल विकास के नए अवसरों पर ध्यान देना होगा। हर गांव में उपलब्ध कौशल की पहचान कर उसे बाजार से जोड़ने की आवश्यकता है। स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय स्तर पर योजनाएं बनाई जानी चाहिए ताकि लोग अपने गांव में ही रोजगार पा सकें और दूसरों को भी काम देने में सक्षम बनें। यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं निकाला गया, तो गांवों का खाली होना जारी रहेगा, जिससे सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक ताने-बाने पर गंभीर असर पड़ेगा। यह समस्या केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना और संसाधनों के लिए भी एक गंभीर खतरा बन सकती है। इसलिए, हमें अभी से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें